Bahan Ki Chut Gubbare Jisi Ful Gai Chud Kar – बहन की चूत गुब्बारे जैसी फुल

Bahan Ki Chut Gubbare Jisi Ful Gai Chud Kar

मै और मेरी बड़ी बहन एक दुसरे के बहुत ही क्लोज है फिर तो आप समझ ही रहे होंगे की क्या हो सकता है ठीक वही जो आप सोच रहे है | तो चलिए जानते है वो क्या सच्चाई है जो मेरे लंड में उबाल आने को मजबूर कर देती है | स्वाति बड़ी ही नटखट और अतरंगी लड़की थी उस समय उसकी उम्र करीब 20-21 साल रही होगी जवानी उबाल मार रही थी उसके कपड़ो से लगता था की गोरे गोरे बूब्स झलक रहे थे | ऐसे हो ही नहीं सकता की स्वाति को देखते ही, कोई भी मर्द का मन और लण्ड मचल ने न लगे। उसकी भौंहें गाढ़ी और नजर तीखी थी। Bahan Ki Chut Gubbare Jisi Ful Gai Chud Kar.

उसके उरोज इतने उभरे हुए थे की उनको उस धागों से कारीगिरी भरी और आयने के छोटे छोटे गोल गोल टुकड़ों को अलग अलग भड़काऊ रंगीले कपड़ों में भरत काम से शुशोभित चोली में समाना लगभग नामुमकिन था। उसके लाल पंखुड़ियों जैसे होठों को लिपस्टिक की जरुरत ही नहीं थी। वह जब चलती थी तो पिछेसे उसकी गांड ऐसे थिरकती थी की देखने वाले मर्दों का सोया हुआ लण्ड भी खड़ा हो जाए। हमारे घर में वह बर्तन, झाड़ू पोछा का काम करती थी।

वह बर्तन साफ़ करने अपना घाघरा अपनी टांगों पे चढ़ा कर जब बैठती थी तो वह एक देखने वाला द्रश्य होता था। मैं उस समय स्कूल में पढ़ता था। मैं अक्सर कई बार उसे बर्तन माँजते हुए देखता रहता था और मन ही मन बड़ा उत्तेजित होता था। जब मैं उसे लोलुपता भरी नजरों से देखता था तो वह भी मुझे शरारत भरी नजरों से देख कर मुस्कुराती रहती थी। मैं अकेला ही नहीं था जो स्वाति के बर्तन साफ़ करने के समय उसकी जाँघों को देखने का शौक़ीन था। एक और शख्श भी उसका दीवाना था। उसका नाम था विकाश प्रसाद। सब उसे विकाश के नामसे बुलाते थे। हमारी कोठीमें वह पाइप से पानी भरने लिए आता था। वह यूपी का भैया था और हॉस्पिटल में वह वार्ड बॉय का काम करता था।                                                           “Bahan Ki Chut Gubbare”

 

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हम एक छोटे से शहर में रहते थे। मेरे पिताजी एक डॉक्टर थे। हमें हॉस्पिटल की और से रहनेके लिए घर मिला था जिसमें पानी का नल नहीं था। हॉस्पिटल के प्रांगण में एक छोटा सा बगीचा था। उसमें एक नल था। हमारे घरमें एक बड़ी टंकी थी जिसमें रोज सुबह विकाश एक लम्बे पाइप से उस नल से पानी भर जाता था। उसी में से रोज हम पानी का इस्तेमाल करते थे।

पता नहीं क्यों, पर स्वाति भी शायद मुझे पसंद करती थी। मैं उससे छोटा था। वह मुझे भैया कह कर बुलाती थी। खास तौर से जब माँ कहीं बाहर गयी होती थी और घरमें मैं अकेला होता था तो झाड़ू लगाते हुए अवसर मिलता था तब वह मेरे कमरे में आती थी वह मेरे पास आकर अपनी मन की बातें करती रहती थी। शायद इस लिए क्यूंकि मैं उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुनता था और बिच बिच में अपने सुझाव या अपनी सहमति दर्शाता था। इसी लिए शायद वह मुझे भी खुश रखना चाहती थी।                                   “Bahan Ki Chut Gubbare”

मैं उससे उम्र में छोटा था। उसका और मेरा शारीरिक सम्बन्ध उन दिनों होना संभव नहीं था फिर भी वह थोड़े समय के लिए ही सही, मेरे पास आकर कुछ न कुछ बातें जरूर करती थी। और मैं जब कुर्सी या पलंग पर से पाँव लटका कर बैठता था तो वह मेरे पास आकर निचे बैठ कर मेरे पाँव पर थोड़ी देर के लिए अपना हाथ फिरा देती थी जिससे मेरे मनमें एक अजीब सा रोमांच होता था और मेरे पाँव के बिच मेरा लण्ड फड़फड़ाने लगता था। पर मैं उस समय अपनी यह उत्तेजना को समझ नहीं पाता था।

अक्सर विकाश सुबह करीब साढ़े नव बजे आता था। उसी समय स्वाति भी झाड़ू, पोछा, बर्तन करने आती थी। मैं देखता था की विकाश स्वाति को देख कर मचल जाता था। कई बार मेरी माँ के इधर उधर होने पर वह स्वाति को छूने की कोशिश करता रहता था। पर स्वाति भी बड़ी अल्हड थी। वह उसके चंगुल में कहाँ आती? वह हँस कर विकाश को अंगूठा दिखाकर भाग जाती थी। स्वाति की हँसी साफ़ दिखा रही थी की वह विकाश को दाना डाल रही थी। घर में सब लोगों के होते हुए विकाश भी और कुछ कर नहीं पाता था।

एक दिन माँ पूजा के रूम में थी। माँ को पूजा करने में करीब आधा घंटा लगता था। विकाश को यह पता था। स्वाति घर के सारे कमरे में झाड़ू लगा रही थी। जैसे ही विकाश पाइप लेकर आया की स्वाति ने मुझसे बोला, “देखो ना भैया, आजकल के जवानों के पास अपना तो कुछ है नहीं तो लोगों को पाइप दिखा कर ही उकसाते रहते हैं।” ऐसा कह कर वह हँसते हुए भाग कर पूजा के कमरे में झाड़ू लगाने के बहाने माँ के पास चली गयी।                                                    “Bahan Ki Chut Gubbare”

 

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वह विकाश को छेड़ रही थी। थोड़ी देर के बाद स्वाति जब झाड़ू लगाकर माँ के कमरे से बाहर आयी तो विकाश अपना काम कर रहा था। जब विकाश ने उसे देखा तो विकाश फुर्ती से स्वाति के पास गया और उसको अपनी बाहों में जकड लिया। स्वाति विकाश के चँगुल में से छूटने के लिए तड़फड़ाने लगी, पर उसकी एक भी न चली। तब उसने जोर से माँ के नाम की आवाज लगाई।

विकाश ने तुरंत उसे छोड़ दिया। जैसे ही स्वाति भाग निकली तो विकाश ने कहा, :आज तो तू माँ का नाम लेकर भाग रही है, पर देखना आगे मैं तुझे दिखाता हूँ की मुझे पाइप से काम नहीं चलाना पड़ता। मेरे पास अपना खुद का भी मोटा सा पाइप है, जिसका तू भी आनंद ले सकती है।”

स्वाति उससे दूर रहते हुए बोली, “हट झूठे, बड़े देखें है आजकल के जवान।” और फिर फुर्ती से घर के बाहर चली गयी।

मैं विकाश को देखता रहा। विकाश ने कुछ खिसियाने स्वर में कहा, “भैया यह नचनियां मुझ पर डोरे डाल तो रही है, पर फंसने से डरती है। साली जायेगी कहाँ? एक न एक दिन तो फंसेगी ही। ”

खैर उसके बाद कुछ दिनों तक विकाश छुट्टी पर चला गया। स्वाति आती थी और मैं देख रहा था की उसकी आँखें विकाश को ढूंढती रहती थी। दो दिन के बाद जब मैंने देखा की वह विकाश को ढूंढ तो रही थी पर बेबसी में किसी को पूछ ने की हिम्मत जुटा नहीं पा रही थी। मैंने तब चुपचाप स्वाति के पास जा कर कहा, “विकाश छुट्टी पर गया है। उसके दादा जी का स्वर्गवास हो गया है। एक हफ्ते के बाद आएगा।”

तब वह अंगूठा दिखाती ठुमका मारती हुई बोली, “उसको ढूंढेगी मेरी जुत्ती। मुझे उससे क्या?”                            “Bahan Ki Chut Gubbare”

मैं जान गया की वह सब तो दिखावा था। वास्तव में तो स्वाति का दिल उस छोरे से लग गया था और उसका बदन विकाश को पाने के लिए अंदर ही अंदर तड़प रहा था।

करीब दस दिन के बाद जब विकाश वापस आया और घरमें पाइप लेकर आया तो स्वाति को देख कर बोला, “याद कर रही थीं न मुझे? बेचैन हो रही थीं न मेरे बगैर?”

स्वाति अंदर से तो बहुत खुश लग रही थी, पर बाहर से गुस्सा दिखाती हुई बोली, “कोई आये या कोई जाए अपनी बला से। मुझे क्या पड़ी है? मझे बता कर कोई थोड़े ही न जाता है?” बात बात में स्वाति ने विकाश को बता ही दिया की उसके न बता ने से स्वाति नाराज थी।

खैर विकाश के आते ही वही कहानी फिर से शुरू हो गयी। विकाश मौक़ा ढूंढता रहता था, स्वाति को छूने का या उसे पकड़ने का, और स्वाति बार बार उसे चकमा दे कर भाग जाती थी।

जब विकाश आता और स्वाति को घाघरा ऊपर चढ़ाये हुए बर्तन मांजते हुए देखता तो वह उसे आँख मारता और सिटी बजा कर स्वाति को इशारा करता रहता था। स्वाति भी मुंह मटका कर मुस्कुरा कर तिरछी नजर से उसके इशारे का जवाब देती थी। हररोज मैं मेरे कमरे की खिड़की में से स्वाति और विकाश की यह इशारों इशारों वाली शरारत भरी हरकतें देखता रहता था। उस समय मुझे सेक्स के बारें में कुछ ज्यादा पता तो नहीं था पर मैं समझ गया था की उन दोनों के बिच में कुछ न कुछ खिचड़ी पक रही थी। मैं मन ही मन बड़ा उत्सुक रहता था यह जानने के लिए की आगे क्या होगा।

कुछ अर्से के बाद मुझे भी स्वाति की और थोड़ा शारीरिक आकर्षण होने लगा। मैं उसके अल्हडपन और मस्त शारीरिक रचना से बड़ा उत्तेजित होने लगा। मैंने अनुभव किया की मेरा लण्ड उसकी याद आते ही खड़ा होने लगता था। मुझे मेरे लण्ड को सहलाना अच्छा लगने लगा। पर मैं तब भी मेरी शारीरिक उत्तेजनाओं को ठीक से समझ नहीं पा रहा था।                         “Bahan Ki Chut Gubbare”

एकदिन मैं अपने कमरे में बैठा अपनी पढ़ाई कर रहा था। माँ पडोसी के घर में कोई धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने गयी थी। झाड़ू लगाते हुए स्वाति मेरे कमरेमें आ पहुंची। जब उसने देखा की आसपास कोई नहीं था तो वह मेरे पास आयी और धीरे से फुफुसाकर बोली, “भैया, एक बात बोलूं? तुम बुरा तो नहीं मानोगे?”

मैं एकदम सावधान हो गया। लगता था उस दिन कुछ ख़ास होने वाला था। मैंने बड़ी आतुरता से स्वाति की और देखा और कहा, “नहीं, मैं ज़रा भी बुरा नहीं मानूंगा। हाँ, बोलो, क्या बात है?”

स्वाति मेरे [पाँव के पास आकर बैठ गयी और बोली, “तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो। तुम सीधे सादे भले इंसान हो। आगे चलकर पढ़ लिख कर तुम बड़े इंसान बनोगे। मैं भला एक गंवार और गरीब। क्या तुम मुझे याद रखोगे?”

 

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ऐसा कह कर वह मेरे निचे लटकते पाँव पर वह हलके हलके प्यारसे हाथ फिराने लगी। उस दिन मैंने चड्डी पहन रखी थी। धीरे धीरे उसका हाथ ऊपर की और बढ़ा और उसने मेरी जांघों पर हाथ फिराना शुरू किया। मेरे मनमें अजीब सी हलचल शुरू हो गयी। स्वाति ने फिर उसका हाथ थोड़ा और ऊपर लिया और उसका हाथ मेरी चड्डी के अंदर घुसेड़ा। मैं थोड़ा हड़बड़ाकर बोला, “स्वाति यह क्या कर रही हो?”

स्वाति अपना हाथ वहीं रखकर बोली, “भैया, अच्छा नहीं लग रहा है क्या? क्या मैं अपना हाथ हटा दूँ?”                “Bahan Ki Chut Gubbare”

मैं चुप रहा। अच्छा तो मुझे लग ही रहा था। मैं जूठ कैसे बोलूं। मैंने कहा, “ऐसी कोई बात नहीं, पर यह तुम क्या कर रही हो?”

“ऐसी कोई बात नहीं” यह सुनकर स्वाति समझ गयी की मुझे उसका हाथ फिराना बहुत अच्छा लग रहा था। उसने अपना हाथ मेरी चड्डी में और घुसेड़ा और मेरा लण्ड अपनी उँगलियों में पकड़ा और उसे प्यार से एकदम धीरे धीरे हिलाने लगी। मेरा लण्ड किसी ने पहली बार पकड़ा था। मुझे एहसास हुआ की मेरे लण्ड में से चिकनाई रिसने लगी थी। उस चकनाई से शायद स्वाति की उंगलियां भी गीली हो गयी थी। पर स्वाति ने मेरे लण्ड को पकड़ रखा। जब मैंने उसका कोई विरोध नहीं किया तो साफ़ था की मैं भी स्वाति के उस कार्यकलाप से बहुत खुश था। मैंने महसूस किया की मेरा लण्ड एकदम बड़ा और खड़ा हो रहा था। देखते ही देखते मेरा लण्ड एकदम कड़क हो गया।

स्वाति ने बड़े प्यार से मेरी निक्कर के बटन खोल दिए और मेरे लण्ड को मेरी चड्डी में से बाहर निकाल दिया। स्वाति बोली, “ऊई माँ यह देखो! हे दैया, यह तो काफी बड़ा है! लगता है अब तुम छोटे नहीं रहे। भैया, देखो, यह कितना अकड़ा हुआ और खड़ा हो गया है।”

मैं खुद देखकर हैरान हो गया। मैं स्वाति की और देखता ही रहा। मेरा गोरा चिट्टा लण्ड उसकी उँगलियों में समा नहीं रहा था। स्वाति ने कहा, “भैया तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो। चलो आज मैं तुम्हें खुश कर देती हूँ।”

ऐसा कहते हुए स्वाति ने मेरे लण्ड को थोड़ी फुर्ती से हिलाना शुरू किया। तब मेरी हालत देखने वाली थी। मैं उत्तेजना के मारे पागल हो रहा था। मैंने लड़का लडकियां एक दूसरे से सेक्स करतें हैं और उसमें लण्ड की भूमिका होती है यह तो सूना था पर यह पहली बार था की मेरा लण्ड कोई दुसरा इंसान हिला रहा था।                                               “Bahan Ki Chut Gubbare”

जब भी मुझे कोई उत्तेजनात्मक विचार आता था या तो मैं कोई लड़की की सेक्सी तस्वीर देखता था तो मैं ही अपना लण्ड सहलाता था। पर जब स्वाति की उंगलियां मेरे खड़े लण्ड से खेलने लगी तो मुझे एक अजीब एहसास हुआ जो बयान करना मुश्किल था।

मेरे पुरे बदन में एक अजीब सी उत्तेजना और आंतरिक उन्माद महसूस होने लगा। न सिर्फ मेरा लण्ड बल्कि मेरे पूरा बदन जैसे एक हलचल पैदा कर रहा था। जैसे जैसे स्वाति ने अपनी उंगलियां मेरे लण्ड की चमड़ी पर दबा कर उसे मुठ मारना तेजी से शुरू किया तो मेरे मन में अजीब सी घंटियाँ बजने लगीं। स्वाति ने मुठ मारने की अपनी गति और तेज कर दी। अब मैं अपने आपे से बाहर हो रहा था ऐसा मुझे लगने लगा।

 

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मैंने स्वाति का घने बालों वाला सर अपने दोंनो हाथों के बिच जकड़ा और मेरे मुंह से निकल पड़ा, “अरे स्वाति यह तुम क्या कर रही हो?” मुझे एक अजीब सा अद्भुत उफान अनुभव हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं उत्तेजना के शिखर पर पहुँच रहा था। मेरा पूरा बदन अकड़ रहा था। मैं स्वाति के हाथ से किया जा रहा हस्तमैथुन की लय में लय मिलाते हुए अपना पेडू ऊपर निचे करने लगा जिससे स्वाति को पता लग गया की मैं भी काफी उत्तेजित हो गया था और जल्दी ही झड़ने वाला था। स्वाति ने अपने हाथों से मुठ मारने की गति और तेज कर दी। मेरा सर चक्कर खा रहा था। एक तरह का नशा मेरे दिमाग पर छा गया था। मेरे शरीर का कोई भी अंग मेरे काबू में नहीं था।                   “Bahan Ki Chut Gubbare”

एक ही झटके में मेरे मुंह से “आह…” निकल पड़ी और इस तरह सिसकारियां लेते हुए मैंने देखा की मेरे लण्ड में से पिचकारियां छूटने लगीं। सफ़ेद सफ़ेद मलाई जैसा चिकना पदार्थ मेरे लण्ड में से निकला ही जा रहा था। स्वाति की उंगलियां मेरी मलाई से सराबोर हो गयीं थी।

मैंने पहली बार मेरे लण्ड से इतनी मलाई निकलते हुए देखि। इसके पहले हर बार जब मैं उत्तेजित हो जाता था, तब जरूर मेरे लण्ड से चिकना पानी रिसता था। पर मेरे लण्ड से इतनी गाढ़ी मलाई निकलते हुए मैंने पहली बार देखि।

स्वाति अपनी उँगलियों को अपने घाघरे से साफ़ करते हुए बोली, ” भैया अब कैसा लग रहा है?”

मैं बुद्धू की तरह स्वाति को देखता ही रह गया। मेरी समझ में नहीं आया की क्या बोलूं। उस समय मैं ऐसे महसूस कर रहा था जैसे मैं आसमान में उड़ रहा था। मैं अपने आपको एकदम हल्का और ताज़ा महसूस कर रहा था जैसे पहले कभी नहीं लगा। इतना उत्तेजक और उन्माद पूर्ण अनुभव उसके पहले मुझे कभी नहीं हुआ था।

मेरी शक्ल देखने वाली रही होगी, क्यूंकि मेरी शक्ल देखकर स्वाति खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली, “देखा न? अब चेहरे पर कैसी हवाईयां उड़ रही हैं? भैया आज आप एक लड़के से मर्द बन गए। अब समझलो की आपको कोई अपनी मर्जी से तैयार हो तो ऐसी औरत को चोदने का लाइसेंस मिल गया। ”                      “Bahan Ki Chut Gubbare”

मैं स्वाति के इस अल्हड़पन से हतप्रभ था। एक लड़की कैसे इतनी खुल्लमखुल्ला सेक्स के बारेमें ऐसी बात कर सकती है, यह मेरी समझ से बाहर था। खैर, उस दिन से जब भी मौक़ा मिलता, स्वाति जरूर मेरे कमरे में झाड़ू पोछे का बहाना करके आती और एक बार मेरे लण्ड को छूती। जब कोई नहीं होता तो वह अपने हाथों से मुझे हस्तमैथुन करा देती। मैं भी उसका इंतजार करते रहता था की कब आएगी |

 

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पर उसे चोदने कम मन होता था फिर सोचता था अभी नहीं थोडा और घुल मिल जाए फिर चोदुंगा आखिर वो दिन आ ही गया | घर में कोई नहीं था मै और स्वाति दीदी ही थे मैंने मुठ मारने के लिए बोला तो स्वाति ने अपने ब्रा पैंटी भी निकाल दी और और मेरे खड़े लंड पर अपनी चूत सेट कर गप से बैठ गयी मेरा लौड़ा घसघसा कर स्वाति के चूत में सेट हो गया उसकी चूत गुब्बारे की तरह फूली लग रही थी |

मुझे खूब मज़ा आ रहा था अब मै निचे से धक्के मारने लगा और स्वाति ऊपर निचे कर रही थी १५ मिनट की ताबड़तोड़ चुदाई के बाद मै स्वाति की चूत में ही झड़ गया |

आगे की स्टोरी फिर कभी बताऊंगा अब स्वाति मेरे बच्चे की माँ बन गयी है उसके पति को लगता है की वो उसका बच्चा है पर स्वाति और मुझे असली सच्चाई पता है की वो हमारा बच्चा है |                                             “Bahan Ki Chut Gubbare”

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